रंज-ना-आसूदगी कर्ब-ए-हुनर देखेगा कौन
नक़्श-ए-फ़र्यादी है किस का दीदा-वर देखेगा कौन
जुम्बिश-ए-लब ही से खुल जाएगा मा'नी का भरम
उस के हर्फ़-ना-शनीदा का असर देखेगा कौन
अपनी दुनिया तक रखो महदूद परवाज़ें अभी
नीलगूँ पहनाइयों में बाल-ओ-पर देखेगा कौन
अपने कमरे का कोई गुल-दान ख़ाली क्यूँ रहे
फूल काग़ज़ के सजा लो सूँघ कर देखेगा कौन
इक खिलौना तोड़ कर चलती बनी पागल हवा
अब ये रेज़ा रेज़ा पैकर जोड़ कर देखेगा कौन
कितनी तहज़ीबों का मदफ़न है हमारी ज़िंदगी
जगमगाए शहर में लेकिन खंडर देखेगा कौन
ग़ज़ल
रंज-ना-आसूदगी कर्ब-ए-हुनर देखेगा कौन
बख़्तियार ज़िया

