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रंज-ए-दुनिया फ़िक्र-ए-उक़्बा जाने क्या क्या दिल में है | शाही शायरी
ranj-e-duniya fikr-e-uqba jaane kya kya dil mein hai

ग़ज़ल

रंज-ए-दुनिया फ़िक्र-ए-उक़्बा जाने क्या क्या दिल में है

शोला करारवी

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रंज-ए-दुनिया फ़िक्र-ए-उक़्बा जाने क्या क्या दिल में है
ज़िंदगी दो दिन की अपनी सैकड़ों मुश्किल में है

राह-ए-उल्फ़त में बहुत कुछ ख़ाक भी छानी मगर
मेरी जानिब से ग़ुबार अब तक किसी के दिल में है

वो जफ़ा-पेशा जफ़ा-जू है जफ़ा उस की सरिश्त
जिस को कहते हैं वफ़ा वो मेरे आब-ओ-गिल में है

तह-नशीं हो कर मिली मौज-ए-हवादिस से नजात
कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ अब दामन-ए-साहिल में है

सख़्त-जानी से मिरी पाला अगर पड़ता उसे
देखता फिर ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

अपनी अपनी गा रहे हैं दोनों शैख़-ओ-बरहमन
दैर-ओ-का'बा में कहाँ है जो हरीम-ए-दिल में है

मरहले हर रोज़ इंसाँ को नए आते हैं पेश
आज उस मंज़िल में है कल दूसरी मंज़िल में है

कुछ तो पास-ए-हुस्न कुछ उन की नज़र का सामना
वो ज़बाँ पर ला नहीं सकता जो मेरे दिल में है

जानता हूँ गो मआल-ए-हज़रत-ए-आदम मगर
कू-ए-जानाँ की तमन्ना फिर भी मेरे दिल में है

देखिए आईना-ए-पीरी में फिर बचपन का हाल
अहद-ए-माज़ी की झलक कुछ अहद-ए-मुस्तक़बिल में है

सोच कर फ़रियाद का अंजाम मैं ख़ामोश हूँ
वर्ना अब भी क़ुव्वत-ए-फ़रियाद मेरे दिल में है

है शिकस्त-ए-बे-सुतूँ मेआ'र-ए-इस्तेदाद-ए-इश्क़
कोहकन का नाम फ़र्द-ए-जौहर-ए-क़ाबिल में है

इश्क़-ए-मजनूँ ने कुछ ऊँचा कर दिया मेयार-ए-हुस्न
वर्ना लैला की हक़ीक़त पर्दा-ए-महमिल में है

कोई है साग़र-ब-कफ़ कोई सुराही-दर-बग़ल
तिश्ना-काम अब तक मगर 'शो'ला' तिरी महफ़िल में है