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रंग सा फिरता है ज़ेर-ए-आसमाँ देखा हुआ | शाही शायरी
rang sa phirta hai zer-e-asman dekha hua

ग़ज़ल

रंग सा फिरता है ज़ेर-ए-आसमाँ देखा हुआ

ख़ालिद अहमद

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रंग सा फिरता है ज़ेर-ए-आसमाँ देखा हुआ
रू-ब-रू इक अक्स है जाने कहाँ देखा हुआ

किस के होने की ख़बर देते हैं ये दीवार-ओ-दर
जाने क्यूँ लगता है मुझ को ये मकाँ देखा हुआ

इक घरौंदा हौले हौले घुल रहा है आज भी
एक मंज़र है तह-ए-आब-ए-रवाँ देखा हुआ

मैं तो पहली बार आया था तुम्हारे शहर में
ना-गहाँ मुझ को लगा शहर-ए-गुमाँ देखा हुआ

इक महक बन कर नज़र उठती है मेरी चार-सू
मैं तो पहरों देखता हूँ ये जहाँ देखा हुआ

हर घड़ी पाया नया धड़का पुराने रंग का
आग अन-देखी लगी उट्ठा धुआँ देखा हुआ

दिन निकलते ही घरों से चल पड़े तेशा-ब-कफ़
सूरज उभरा है कि इक कोह-ए-गिराँ देखा हुआ

माँद रह जाएगी इस शब आँसुओं की आब भी
चाँद फिर निकला पस-ए-दीवार-ए-जाँ देखा हुआ

आसमाँ था या शिकस्ता छत अँधेरी क़ब्र की
रात भर देखा किया मैं आसमाँ देखा हुआ

साथ चलता है किनारे पर किनारों की तरह
क्या कहूँ 'ख़ालिद' कि है ये मेहरबाँ देखा हुआ