रंग-ओ-रामिश ज़मज़मे गुल-हा-ए-तर होते हुए
दिल अकेला और इतने हम-सफ़र होते हुए
आँसुओं से सर्द हो जाती है हर सीने की आग
मेरा दिल आतिश-कदा है चश्म-तर होते हुए
दिल की दुनिया में अंधेरा हो तो कुछ रौशन नहीं
आँख चशम-ए-संग है शम्स ओ क़मर होते हुए
चश्म आगे एक चेहरा पाँव गो चक्कर में हैं
दर-ब-दर होता नहीं दिल दर-ब-दर होते हुए
हौसला टूटा तो वो इबरत का मंज़र आ गया
उड़ नहीं पाया परिंदा बाल-ओ-पर होते हुए
निस्फ़ दुनिया भूक से और प्यास से मग़्लूब है
दस्त ओ बाज़ू ज़ेहन ओ दिल लाल-ओ-गुहर होते हुए
हर कस-ओ-ना-कस पे कर लेता है फ़ौरन ए'तिबार
बे-ख़बर कितना है 'ख़ालिद' बा-ख़बर होते हुए
ग़ज़ल
रंग-ओ-रामिश ज़मज़मे गुल-हा-ए-तर होते हुए
ख़ालिद महमूद

