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रंग-ओ-रामिश ज़मज़मे गुल-हा-ए-तर होते हुए | शाही शायरी
rang-o-ramish zamzame gul-ha-e-tar hote hue

ग़ज़ल

रंग-ओ-रामिश ज़मज़मे गुल-हा-ए-तर होते हुए

ख़ालिद महमूद

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रंग-ओ-रामिश ज़मज़मे गुल-हा-ए-तर होते हुए
दिल अकेला और इतने हम-सफ़र होते हुए

आँसुओं से सर्द हो जाती है हर सीने की आग
मेरा दिल आतिश-कदा है चश्म-तर होते हुए

दिल की दुनिया में अंधेरा हो तो कुछ रौशन नहीं
आँख चशम-ए-संग है शम्स ओ क़मर होते हुए

चश्म आगे एक चेहरा पाँव गो चक्कर में हैं
दर-ब-दर होता नहीं दिल दर-ब-दर होते हुए

हौसला टूटा तो वो इबरत का मंज़र आ गया
उड़ नहीं पाया परिंदा बाल-ओ-पर होते हुए

निस्फ़ दुनिया भूक से और प्यास से मग़्लूब है
दस्त ओ बाज़ू ज़ेहन ओ दिल लाल-ओ-गुहर होते हुए

हर कस-ओ-ना-कस पे कर लेता है फ़ौरन ए'तिबार
बे-ख़बर कितना है 'ख़ालिद' बा-ख़बर होते हुए