रंग में हम मस से बतर हो चुके
लेक उसी मस से कि ज़र हो चुके
रुख़ को तिरे शब से मैं तश्बीह दूँ
पर इसी शब से कि सहर हो चुके
चेहरा तिरा है मह-ए-नौ ऐ सनम
पर वो मह-ए-नौ कि क़मर हो चुके
रश्क-ए-गुल सेब है तेरा ज़नख़
लेक वही गुल कि समर हो चुके
क़तरा-ए-नैसाँ हैं वो दंदाँ 'बक़ा'
पर वही क़तरा कि गुहर हो चुके
ग़ज़ल
रंग में हम मस से बतर हो चुके
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

