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रंग लाई है मिरी ज़ात से ग़फ़लत मेरी | शाही शायरी
rang lai hai meri zat se ghaflat meri

ग़ज़ल

रंग लाई है मिरी ज़ात से ग़फ़लत मेरी

सुलतान रशक

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रंग लाई है मिरी ज़ात से ग़फ़लत मेरी
मेरे अंदर मुतज़लज़ल है हुकूमत मेरी

बेचता फिरता हूँ ख़ुद को सर-ए-बाज़ार-ए-हयात
मुझ को रुस्वा किए रखती है ज़रूरत मेरी

डूबता जाता है हर शख़्स सर-ए-साहिल-ए-शब
बढ़ती जाती है मगर शब से अक़ीदत मेरी

आते-जाते हैं मह-ओ-मेहर बशर की ज़द में
और मैं ख़ुश कि दरख़्शाँ है रिवायत मेरी

वक़्त वो है कि हर इक क़द्र का मफ़्हूम नया
और बेगाना-ए-हालात तबीअत मेरी

अपने चेहरे पे सजाए भी नहीं ज़ख़्म मगर
दिल का आईना हुई जाती है सूरत मेरी