रंग बदला है कई दिन से मिज़ाज-ए-यार का
जोड़ शायद चल गया फिर आज कल अग़्यार का
कस क़दर पाया सवेदा-ए-दिल-ए-आशिक़ ने औज
रफ़्ता रफ़्ता तिल बना आख़िर तिरे रुख़्सार का
अब तो आ कर देख जाना चाहिए तुझ को ज़रूर
हाल है नौ-ए-दिगर ईसा तिरे बीमार का
बे-ख़ुदी में ज़ख़्म-ए-दिल पर जबकि पड़ती है नज़र
होता है धोका तुम्हारे रौज़न-ए-दीवार का
हाल-ए-दर्द-ए-दिल बयाँ किस से करूँ मैं बद-नसीब
तू ही जब पुरसाँ न हो ले मेरे हाल-ए-ज़ार का
बात करना हो गया मुश्किल बुतों के सामने
पड़ गया फंदा गले में रिश्ता-ए-ज़ुन्नार का
हो गया हूँ ना-तवाँ ऐसा तुम्हारे हिज्र में
तोड़ना मुश्किल हुआ है आँसुओं के तार का
इक फ़क़त तेरे कशीदा होने से ये हाल है
भागता है साया तक मुझ से तिरी दीवार का
ना-तवाँ ऐसा हूँ पिस कर ख़ाक हो जाऊँ अभी
साया पड़ जाए अगर मुझ पर तिरी दीवार का
अब तो सूरत अपनी दिखलाओ ख़ुदा के वास्ते
दम निकलता है तुम्हारे तालिब-ए-दीदार का
अपनी कम-फ़हमी से 'अंजुम' हम निहायत तंग हैं
ज़ेहन में आता नहीं मज़मूँ दहान-ए-यार का
ग़ज़ल
रंग बदला है कई दिन से मिज़ाज-ए-यार का
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

