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रखता हूँ तलाई रंग और अश्क भी मोती है | शाही शायरी
rakhta hun talai rang aur ashk bhi moti hai

ग़ज़ल

रखता हूँ तलाई रंग और अश्क भी मोती है

इश्क़ औरंगाबादी

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रखता हूँ तलाई रंग और अश्क भी मोती है
मुनइम के भी घर आख़िर दौलत यही होती है

सुम्बुल की परेशानी कब कम थी कि फिर तिस पर
शबनम जो सरिश्क उस के मिज़्गाँ में पिरोती है

आली से मैं जा पूछा क्या वाक़िआ याँ गुज़रा
गुल चाक-गरेबाँ है शबनम है कि रोती है

दम सर्द ही वो भर कर ये मुझ से लगा कहने
हर सुब्ह गुलिस्ताँ की हालत यही होती है

'इश्क़' अपनी फ़ना का ख़ौफ़ सरकश के नहीं दिल में
कब शम्अ ये है रौशन जो सुब्ह भी होती है