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'रईस' अश्कों से दामन को भिगो लेते तो अच्छा था | शाही शायरी
rais ashkon se daman ko bhigo lete to achchha tha

ग़ज़ल

'रईस' अश्कों से दामन को भिगो लेते तो अच्छा था

रईस अमरोहवी

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'रईस' अश्कों से दामन को भिगो लेते तो अच्छा था
हुज़ूर-ए-दोस्त कुछ गुस्ताख़ हो लेते तो अच्छा था

जुदाई में ये शर्त-ए-ज़ब्त-ए-ग़म तो मार डालेगी
हम उन के सामने कुछ देर रो लेते तो अच्छा था

बहारों से नहीं जिन को तवक़्क़ो लाला-ओ-गुल की
वो अपने वास्ते काँटे ही बो लेते तो अच्छा था

अभी तो निस्फ़ शब है इंतिज़ार-ए-सुब्ह-ए-नौ कैसा
दिल-ए-बेदार हम कुछ देर सो लेते तो अच्छा था

क़लम-रौ दाद-ए-ख़ून-ओ-अश्क लिखने से झिजकता है
क़लम को अश्क-ओ-ख़ूँ ही में डुबो लेते तो अच्छा था

फ़क़त इक गिर्या-ए-शबनम किफ़ायत कर नहीं सकता
चमन वाले कभी जी-भर के रो लेते तो अच्छा था

सुराग़-ए-कारवाँ तक खो गया अब सोचते ये हैं
कि गर्द-ए-कारवाँ के साथ हो लेते तो अच्छा था