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रहना हर दम बुझा बुझा सा कुछ | शाही शायरी
rahna har dam bujha bujha sa kuchh

ग़ज़ल

रहना हर दम बुझा बुझा सा कुछ

रसा चुग़ताई

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रहना हर दम बुझा बुझा सा कुछ
हो गया दिल का मश्ग़ला सा कुछ

तेरी ज़ुल्फ़ों का मेरी वहशत का
मिलता-जुलता है सिलसिला सा कुछ

हम से मिलने को इक ज़माना मिला
तेरा मिलना था सानेहा सा कुछ

ऐसा उजड़ा सनम-कदा दिल का
हो गया ख़ाना-ए-ख़ुदा सा कुछ

दिल के सहरा में आ निकलता है
अब भी कोई गुरेज़-पा सा कुछ

लुत्फ़-ए-दीवानगी नहीं आया
बज़्म में लोग थे शनासा कुछ