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रब्त-ए-पिन्हाँ की सदाक़त है न मिलना तेरा | शाही शायरी
rabt-e-pinhan ki sadaqat hai na milna tera

ग़ज़ल

रब्त-ए-पिन्हाँ की सदाक़त है न मिलना तेरा

रविश सिद्दीक़ी

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रब्त-ए-पिन्हाँ की सदाक़त है न मिलना तेरा
तेरे मिलने ही की सूरत है न मिलना तेरा

क्यूँ मिरा शौक़-ए-फ़रावाँ है ब-हर लम्हा फ़ुज़ूँ
क्या कोई राज़-ए-मशिय्यत है न मिलना तेरा

लाला-ओ-गुल मह-ओ-अंजुम से गिला है क्या क्या
और मक़्सूद-ए-शिकायत है न मिलना तेरा

किसी सूरत किसी उनवाँ से तलाफ़ी न हुई
किस क़दर तल्ख़ हक़ीक़त है न मिलना तेरा

ज़िंदगी ने तिरे मिलने का बहाना समझा
वर्ना दर-अस्ल क़यामत है न मिलना तेरा

फिर भी तेरे लिए आवारा-ए-ग़ुर्बत है 'रविश'
गरचे शायान-ए-मोहब्बत है न मिलना तेरा