रबाब-ए-हुस्न है या कोई साज़-ए-उल्फ़त है
समझ में आ न सकी दिल की जो हक़ीक़त है
कुदूरतों से ये अहल-ए-जहाँ की हालत है
न अब दिलों में सफ़ाई न रस्म-ए-उल्फ़त है
मरीज़-ए-हिज्र की अब कुछ अजीब हालत है
न होश ही में है अपने न ख़्वाब-ए-ग़फ़लत है
बने जो और बिगड़ जाए है मिरी तक़दीर
बिगड़ बिगड़ के बने जो अदू की क़िस्मत है
क़दम क़दम पे हैं सहरा के ख़ार दामन-गीर
वफ़ा की राह में हर-गाम पर मुसीबत है
ज़बाँ खुलेगी न महशर में सामने उन के
करे जो हश्र में फ़रियाद किस की जुरअत है
गुलों का खुल के बिखरना है आइना ग़म का
चमन का यूँ तो हर इक पत्ता नक़्श-ए-इबरत है
बिखर रहा है किताब-ए-जहाँ का शीराज़ा
क़यामत आने से पहले ये क्या क़यामत है
सिमट के आ गई पहलू में काएनात-ए-जहाँ
समझ में आ नहीं सकती जो दिल की वुसअ'त है
ये ज़ौक़-ए-शेर-ओ-सुख़न फ़ितरतन है ऐ 'शो'ला'
नुमूद-ओ-नाम की ख़्वाहिश न फ़िक्र-ए-शोहरत है
ग़ज़ल
रबाब-ए-हुस्न है या कोई साज़-ए-उल्फ़त है
शोला करारवी

