राज़-ए-हस्ती तिश्ना-ए-ता'बीर है तेरे बग़ैर
ज़िंदगी तक़्सीर ही तक़्सीर है तेरे बग़ैर
ज़ीस्त की हर कामयाबी भी मिरी नज़रों में ख़ाक
एक बे-बुनियाद सी ता'मीर है तेरे बग़ैर
जिस को होना चाहिए था ताज़ा-दम कलियों का हार
वो नफ़स का सिलसिला ज़ंजीर है तेरे बग़ैर
हाँ वही लब जो तबस्सुम का ख़ज़ाना था कभी
आज रेहन-ए-नाला-ए-शब-गीर है तेरे बग़ैर
दिल की हालत है कि जैसे इक तिलिस्म-ए-बे-कलीद
हर तमन्ना हर्फ़-ए-बे-ता'बीर है तेरे बग़ैर
हो नहीं पाती कोई आसान सी मुश्किल भी सहल
कुंद सा हर नाख़ुन-ए-तदबीर है तेरे बग़ैर
चाँद बरसाता है जब रातों को अमृत की फुवार
हाँ उसी की हर लड़ी इक तीर है तेरे बग़ैर
रौशनी उस के किसी रुख़ पर भी आ पाती नहीं
ज़िंदगी धुँदली सी इक तस्वीर है तेरे बग़ैर
आ अगर बेगाना-ए-एहसास तेरा दिल नहीं
तेरा 'मुल्ला' ख़स्ता-ओ-दिलगीर है तेरे बग़ैर
ग़ज़ल
राज़-ए-हस्ती तिश्ना-ए-ता'बीर है तेरे बग़ैर
आनंद नारायण मुल्ला

