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राज़-ए-हस्ती तिश्ना-ए-ता'बीर है तेरे बग़ैर | शाही शायरी
raaz-e-hasti tishna-e-tabir hai tere baghair

ग़ज़ल

राज़-ए-हस्ती तिश्ना-ए-ता'बीर है तेरे बग़ैर

आनंद नारायण मुल्ला

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राज़-ए-हस्ती तिश्ना-ए-ता'बीर है तेरे बग़ैर
ज़िंदगी तक़्सीर ही तक़्सीर है तेरे बग़ैर

ज़ीस्त की हर कामयाबी भी मिरी नज़रों में ख़ाक
एक बे-बुनियाद सी ता'मीर है तेरे बग़ैर

जिस को होना चाहिए था ताज़ा-दम कलियों का हार
वो नफ़स का सिलसिला ज़ंजीर है तेरे बग़ैर

हाँ वही लब जो तबस्सुम का ख़ज़ाना था कभी
आज रेहन-ए-नाला-ए-शब-गीर है तेरे बग़ैर

दिल की हालत है कि जैसे इक तिलिस्म-ए-बे-कलीद
हर तमन्ना हर्फ़-ए-बे-ता'बीर है तेरे बग़ैर

हो नहीं पाती कोई आसान सी मुश्किल भी सहल
कुंद सा हर नाख़ुन-ए-तदबीर है तेरे बग़ैर

चाँद बरसाता है जब रातों को अमृत की फुवार
हाँ उसी की हर लड़ी इक तीर है तेरे बग़ैर

रौशनी उस के किसी रुख़ पर भी आ पाती नहीं
ज़िंदगी धुँदली सी इक तस्वीर है तेरे बग़ैर

आ अगर बेगाना-ए-एहसास तेरा दिल नहीं
तेरा 'मुल्ला' ख़स्ता-ओ-दिलगीर है तेरे बग़ैर