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रात कितने ना-तराशीदा गुहर भी लाएगी | शाही शायरी
raat kitne na-tarashida guhar bhi laegi

ग़ज़ल

रात कितने ना-तराशीदा गुहर भी लाएगी

जमील मलिक

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रात कितने ना-तराशीदा गुहर भी लाएगी
ना-तराशीदा सी ज़ौ लेकिन सहर भी लाएगी

जगमगा उट्ठेंगे शाख़ों पर गुलाबों के चराग़
जब बहार आई तो अपने बाल-ओ-पर भी लाएगी

आज तक लौटे नहीं नादीदा शम्ओं' के सफ़ीर
जुगनुओं की रौशनी उन की ख़बर भी लाएगी

जब मिली आवारगी को मंज़िल-ए-ख़ुद-आगही
दश्त में खोए हुओं को अपने घर भी लाएगी

ख़ाक से तख़्लीक़ होगी आतिश-ओ-आब-ओ-हवा
ज़िंदगी ख़ुद अपना सामान-ए-सफ़र भी लाएगी

ता-ब-कै छुप कर करोगे मेरा सर तन से जुदा
देखना कल की गवाही मेरा सर भी लाएगी

जब बुझेगी आग तो अपने ही नग़्मों से 'जमील'
ज़र्द आँधी बारिश-ए-बर्क़-ओ-शरर भी लाएगी