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रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए | शाही शायरी
raat ki aaghosh se manus itne ho gae

ग़ज़ल

रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए

अज़हर फ़राग़

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रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए
रौशनी में आए तो हम लोग अंधे हो गए

आँगनों में दफ़्न हो कर रह गई हैं ख़्वाहिशें
हाथ पीले होते होते रंग पीले हो गए

भीड़ में गुम हो गए हम अपनी उँगली छोड़ कर
मुनफ़रिद होने की धुन में औरों जैसे हो गए

ज़िंदा रहने के लिए कुछ बे-हिसी दरकार थी
सोचते रहने से भी कुछ ज़ख़्म गहरे हो गए

इस लिए मोहतात हूँ अपनी नुमूदारी से मैं
फल तो फल मुझ पेड़ के पत्ते भी मीठे हो गए