रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए
रौशनी में आए तो हम लोग अंधे हो गए
आँगनों में दफ़्न हो कर रह गई हैं ख़्वाहिशें
हाथ पीले होते होते रंग पीले हो गए
भीड़ में गुम हो गए हम अपनी उँगली छोड़ कर
मुनफ़रिद होने की धुन में औरों जैसे हो गए
ज़िंदा रहने के लिए कुछ बे-हिसी दरकार थी
सोचते रहने से भी कुछ ज़ख़्म गहरे हो गए
इस लिए मोहतात हूँ अपनी नुमूदारी से मैं
फल तो फल मुझ पेड़ के पत्ते भी मीठे हो गए
ग़ज़ल
रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए
अज़हर फ़राग़

