EN اردو
रात के पिछले पहर रोने के आदी रोए | शाही शायरी
raat ke pichhle pahar rone ke aadi roe

ग़ज़ल

रात के पिछले पहर रोने के आदी रोए

अहमद फ़राज़

;

रात के पिछले पहर रोने के आदी रोए
आप आए भी मगर रोने के आदी रोए

उन के आ जाने से कुछ थम से गए थे आँसू
उन के जाते ही मगर रोने के आदी रोए

हाए पाबंदी-ए-आदाब तिरी महफ़िल की
कि सर-ए-राहगुज़र रोने के आदी रोए

एक तक़रीब-ए-तबस्सुम थी बहाराँ लेकिन
फिर भी आँखें हुईं तर रोने के आदी रोए

दर्द-मंदों को कहीं भी तो क़रार आ न सका
कोई सहरा हो कि घर रोने के आदी रोए

ऐ 'फ़राज़' ऐसे में बरसात कटेगी क्यूँकर
गर यूँही शाम-ओ-सहर रोने के आदी रोए