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राम तुम्हारे युग का रावन अच्छा था | शाही शायरी
ram tumhaare yug ka rawan achchha tha

ग़ज़ल

राम तुम्हारे युग का रावन अच्छा था

प्रताप सोमवंशी

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राम तुम्हारे युग का रावन अच्छा था
दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था

दुख दे कर ही चैन कहाँ था ज़ालिम को
टूट पड़ा था चेहरे पर वो पढ़ता था

शाम ढले ये टीस तो भीतर उठती है
मेरा ख़ुद से हर इक वा'दा झूटा था

ये भी था कि दिल को कितना समझा लो
बात ग़लत होती थी तो वो लड़ता था

मेरे दौर को कुछ यूँ लिक्खा जाएगा
राजा का किरदार बहुत ही बौना था