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राहें तो बहुत थीं ज़िंदगी में | शाही शायरी
rahen to bahut thin zindagi mein

ग़ज़ल

राहें तो बहुत थीं ज़िंदगी में

महशर बदायुनी

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राहें तो बहुत थीं ज़िंदगी में
हम खो गए इश्क़-ओ-आशिक़ी में

जो बात किसी में चाहते थे
अब तक न मिली हमें किसी में

वो लम्हा जो तेरे साथ गुज़रा
वो लम्हा बहुत है ज़िंदगी में

पैकर है वो एक सादगी का
सौ रंग हैं उस की सादगी में

दरिया पे भी जा के लौट आए
डूबे हुए कैफ़-ए-तिश्नगी में

अंजाम-ए-बहार सूझता क्या
आग़ाज़-ए-बहार की ख़ुशी में

ऐसे बहुत आफ़्ताब उभरे
जो डूब गए हैं तीरगी में