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राह-ओ-रस्म-ए-ख़त-किताबत ही सही | शाही शायरी
rah-o-rasm-e-KHat-kitabat hi sahi

ग़ज़ल

राह-ओ-रस्म-ए-ख़त-किताबत ही सही

इस्माइल मेरठी

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राह-ओ-रस्म-ए-ख़त-किताबत ही सही
गुल नहीं तो गुल की निकहत ही सही

दिल-लगी का कोई सामाँ चाहिए
क़हत-ए-मअनी हो तो सूरत ही सही

बे-दिमाग़ी बंदा-परवर इस क़दर
आप की सब पर हुकूमत ही सही

दोस्ती का मैं ने कब दावा किया
दूर की साहब सलामत ही सही

बस-कि ज़िक्र-उल-एेश निस्फ़-उल-एेश है
याद-ए-अय्याम-ए-फ़राग़त ही सही

वक़्त मिलने का मुअय्यन कीजिए
ख़्वाह फ़र्दा-ए-क़यामत ही सही

हुस्न-ए-सूरत का न खा असलन फ़रेब
क्लिक-ए-सनअत-गर की सनअत ही सही

कुछ न करना भी मगर इक काम है
गर नहीं सोहबत तो उज़्लत ही सही