राह-ओ-रस्म-ए-ख़त-किताबत ही सही
गुल नहीं तो गुल की निकहत ही सही
दिल-लगी का कोई सामाँ चाहिए
क़हत-ए-मअनी हो तो सूरत ही सही
बे-दिमाग़ी बंदा-परवर इस क़दर
आप की सब पर हुकूमत ही सही
दोस्ती का मैं ने कब दावा किया
दूर की साहब सलामत ही सही
बस-कि ज़िक्र-उल-एेश निस्फ़-उल-एेश है
याद-ए-अय्याम-ए-फ़राग़त ही सही
वक़्त मिलने का मुअय्यन कीजिए
ख़्वाह फ़र्दा-ए-क़यामत ही सही
हुस्न-ए-सूरत का न खा असलन फ़रेब
क्लिक-ए-सनअत-गर की सनअत ही सही
कुछ न करना भी मगर इक काम है
गर नहीं सोहबत तो उज़्लत ही सही
ग़ज़ल
राह-ओ-रस्म-ए-ख़त-किताबत ही सही
इस्माइल मेरठी

