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राह-ए-गुम-कर्दा सर-ए-मंज़िल भटक कर आ गया | शाही शायरी
rah-e-gum-karda sar-e-manzil bhaTak kar aa gaya

ग़ज़ल

राह-ए-गुम-कर्दा सर-ए-मंज़िल भटक कर आ गया

फ़र्रुख़ जाफ़री

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राह-ए-गुम-कर्दा सर-ए-मंज़िल भटक कर आ गया
सुब्ह का भूला था लेकिन शाम को घर आ गया

जैसे उस को रोक सकना अपने बस में ही नहीं
जब भी चाहा बे-इजाज़त घर के अंदर आ गया

भाग कर जाएँ कहाँ अब तू ही कुछ तदबीर कर
सामने अपने समुंदर सर पे लश्कर आ गया

उस ने कोशिश तो बहुत की सर बचाने की मगर
जिस तरफ़ से था नहीं अंदेशा पत्थर आ गया

हम न कहते थे कि 'फ़र्रुख़' आदमी अच्छा नहीं
देख तुझ को भी यक़ीं अब इस से मिल कर आ गया