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क़िस्मत से लड़ती हैं निगाहें | शाही शायरी
qismat se laDti hain nigahen

ग़ज़ल

क़िस्मत से लड़ती हैं निगाहें

सिराज लखनवी

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क़िस्मत से लड़ती हैं निगाहें
तेरे होते किस को चाहें

उल्टी देखें इश्क़ की राहें
हँसना पड़े जब रोना चाहें

इशरत-ए-माज़ी को रोता हूँ
ग़म के गले में डाल के बाहें

नाज़ुक नाज़ुक जज़्बे दिल के
हल्की हल्की ठंडी आहें

शीशा-ए-दिल के हर टुकड़े में
एक इक सूरत किस को चाहें

मेरे मुक़द्दर के सर-नामे
जलते आँसू ठंडी आहें

दुखते हुए दिल की रग रग में
तुम चुटकी लो हम न कराहें

हाए तिरे पाबंद-ए-मोहब्बत
क़ैदी आँसू मुजरिम आहें

एक इक साँस जवाब-तलब है
कैसे नाले कैसी आहें

क्या न गुज़रती होगी दिल पर
रो न सकें जब रोना चाहें

सुर्ख़ आँखें हैं भरे हैं आँसू
किस से 'सिराज' लड़ी हैं निगाहें