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क़वी दिल शादमाँ दिल पारसा दिल | शाही शायरी
qawi dil shadman dil parsa dil

ग़ज़ल

क़वी दिल शादमाँ दिल पारसा दिल

हसरत मोहानी

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क़वी दिल शादमाँ दिल पारसा दिल
तिरे आशिक़ ने भी पाया है क्या दिल

लगा दो आग उज़्र-ए-मस्लहत को
कि है बे-ज़ार इस शय से मिरा दिल

जफ़ाकारी है तस्लीम-ए-सितम भी
न होगा ताबा-ए-जौर-ओ-जफ़ा दिल

लगा कर आँख इस जान-ए-जहाँ से
न होगा अब किसी से आश्ना दिल

मिटे अफ़कार-ए-गोना-गों के झगड़े
तिरे ग़म को न दे क्यूँकर दुआ दिल

न पहुँचेगी कभी क्या गोश-ए-गुल तक
क़फ़स से उड़ के फ़रियाद-ए-अना दिल

तू अना-ए-सदाक़त है तो हरगिज़
न होगा पैरव-ए-बातिल मिरा दिल

बड़ी दरगाह का साइल हूँ 'हसरत'
बड़ी उम्मीद है मेरी बड़ा दिल