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क़ैद-ए-दिल से है मिरी काकुल-ए-पेचाँ नाज़ाँ | शाही शायरी
qaid-e-dil se hai meri kakul-e-pechan nazan

ग़ज़ल

क़ैद-ए-दिल से है मिरी काकुल-ए-पेचाँ नाज़ाँ

शाह आसिम

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क़ैद-ए-दिल से है मिरी काकुल-ए-पेचाँ नाज़ाँ
और मिरे क़त्ल से है ख़ंजर-ए-मिज़्गाँ नाज़ाँ

है मिरी चंगुल-ए-वहशत से गरेबाँ नाज़ाँ
और मिरी बारिश-ए-अश्कों से है दामाँ नाज़ाँ

काफ़िर-ए-इश्क़ हुआ जब से मैं इस दहर में हूँ
है मिरे कुफ़्र से ये दीन और ईमाँ नाज़ाँ

ज़ख़्म खाने से मिरे फ़ख़्र-कुनाँ है ये दिल
ख़ून-ए-दिल से हैं मिरे दीदा-ए-गिर्यां नाज़ाँ

साकिन-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर हुआ हूँ जब से
मिस्ल हर हल्क़ा-ए-ज़ंजीर है ज़िंदाँ नाज़ाँ

हूँ वो मजनूँ कि मिरे आबला-हा-ए-पा से
दश्त-ए-वहशत में है हर ख़ार-ए-बयाबाँ नाज़ाँ

महव-ए-इश्क़-ए-शह-ए-ख़ादिम हूँ मैं 'आसिम' यकसर
हुस्न पर जिस के हैं ये मेरे दिल-ओ-जाँ नाज़ाँ