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क़ब्र पर होवें दो न चार दरख़्त | शाही शायरी
qabr par howen do na chaar daraKHt

ग़ज़ल

क़ब्र पर होवें दो न चार दरख़्त

रिन्द लखनवी

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क़ब्र पर होवें दो न चार दरख़्त
एक काफ़ी है साया-दार दरख़्त

था मैं दीवाना गोर पर है ज़रूर
बेद-ए-मजनूँ का साया-दार दरख़्त

हों वो बद-बख़्त मेरे साए से
ख़ुश्क होते हैं बार-दार दरख़्त

तू जो ऐ सर्व बाग़ में जाए
समर ओ गुल करें निसार दरख़्त

पस्त हों तुझ से ग़ैरत-ए-तूबा
एक क्या हों अगर हज़ार दरख़्त

वाह-रे मेरे आह के झोंके
उड़ते फिरते हैं काह-वार दरख़्त

मैं जो तासीर-ए-आह दिखलाऊँ
कोह हिल जाएँ दरकिनार दरख़्त

बाग़-ए-हस्ती में ज़ोफ़-ए-पीरी से
'रिन्द' हूँ मिस्ल-ए-बीख़-ख़ार दरख़्त

बाग़बाँ क्यूँ न जाने इस को फ़ुज़ूल
कर चुके अपनी जब बहार दरख़्त