क़ाएम है सुरूर-ए-मय-ए-गुलफ़ाम हमारा
क्या ग़म है अगर टूट गया जाम हमारा
इतना भी किसी दोस्त का दुश्मन न हो कोई
तकलीफ़ है उन के लिए आराम हमारा
फूलों से मोहब्बत है तक़ाज़ा-ए-तबीअत
काँटों से उलझना तो नहीं काम हमारा
भूले से कोई नाम वफ़ा का नहीं लेता
दुनिया को अभी याद है अंजाम हमारा
ग़ैर आ के बने हैं सबब-ए-रौनक़-ए-महफ़िल
अब आप की महफ़िल में है क्या काम हमारा
मौसम के बदलते ही बदल जाती हैं आँखें
यारान-ए-चमन भूल गए नाम हमारा
ग़ज़ल
क़ाएम है सुरूर-ए-मय-ए-गुलफ़ाम हमारा
कलीम आजिज़

