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प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए | शाही शायरी
pyar ke rang-mahal barson mein tayyar hue

ग़ज़ल

प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए

शहज़ाद अहमद

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प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए
और इक लम्हे में ग़ाएब दर-ओ-दीवार हुए

फिर जो देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था मौजूद
हम तो बस आँख झपकने के गुनहगार हुए

हम सियह-बख़्तों ने सूरज नहीं देखा बरसों
सुब्ह-दम आँख लगी रात को बेदार हुए

ये भी मुमकिन है कि हाथ आए कोई और ज़मीं
राह-ए-गुम-कर्दा अगर क़ाफ़िला-सालार हुए