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पुर्सिश है चश्म-ए-अश्क-फ़शाँ पर न आए हर्फ़ | शाही शायरी
pursish hai chashm-e-ashk-e-fasha par na aae harf

ग़ज़ल

पुर्सिश है चश्म-ए-अश्क-फ़शाँ पर न आए हर्फ़

अब्दुल मन्नान तरज़ी

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पुर्सिश है चश्म-ए-अश्क-फ़शाँ पर न आए हर्फ़
डूबें भी हम तो सैल-ए-रवाँ पर न आए हर्फ़

दोनों ही अपनी अपनी जगह ला-जवाब हैं
अपने यक़ीं पे उन के गुमाँ पर न आए हर्फ़

ऐ रश्क इतना वहम-ओ-गुमाँ भी बजा नहीं
एहसास-ए-क़ुर्बत-ए-रग-ए-जाँ पर न आए हर्फ़

दिल ना-मुराद शो'ला-ए-आरिज़ से जल गया
डरते थे हम कि सोज़-ए-निहाँ पर न आए हर्फ़

हुशियार बज़्म-ए-ग़ैर में नाम उन का आ न जाए
ऐ नग़्मा-संज जोश-ए-बयाँ पर न आए हर्फ़

तीर-ए-निगाह दिल में तराज़ू हुआ तो हो
अब तेरे अबरुओं की कमाँ पर न आए हर्फ़

हम उन के रू-ब-रू रहे इस मस्लहत से चुप
महफ़िल में अपने इज्ज़-ए-बयाँ पर न आए हर्फ़

उड़ जाए तेग़ से तो रहे सरफ़राज़ सर
कट जाए बात पर तो ज़बाँ पर न आए हर्फ़

इस कश्मकश में तेरी गली से परे रहे
आए कहाँ पे हर्फ़ कहाँ पर न आए हर्फ़

'तर्ज़ी' तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-ख़ाली से ख़ुश नहीं
बस जाओ तुम तो दिल के मकाँ पर न आए हर्फ़