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पिंदार-ए-ज़ोहद हो कि ग़ुरूर-ए-बरहमनी | शाही शायरी
pindar-e-zohd ho ki ghurur-e-barhamani

ग़ज़ल

पिंदार-ए-ज़ोहद हो कि ग़ुरूर-ए-बरहमनी

हिमायत अली शाएर

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पिंदार-ए-ज़ोहद हो कि ग़ुरूर-ए-बरहमनी
इस दौर-ए-बुतशिकन में है हर बुत शिकस्तनी

सरसर चले कि तुंद बगूलों का रक़्स हो
मौज-ए-नुमू रवाँ है तो हर गुल शगुफ़्तनी

गुल-चीन-ओ-गुल-फ़रोश की ख़ातिर है फ़स्ल-ए-गुल
और क़िस्मत-ए-जुनूँ है फ़क़त चाक-दामनी

दीवार-ए-अब्र खींचिए किरनों की राह में
ज़र्रों में क़ैद कीजिए सूरज की रौशनी

मौज-ए-नफ़स से लरज़े है तार-ए-रग-ए-हयात
फैली है शहर-ए-दिल में वो पुर-हौल सनसनी