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फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए | शाही शायरी
phir wo nazar hai izn-e-tamasha liye hue

ग़ज़ल

फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए

गोपाल मित्तल

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फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए
तज्दीद-ए-आरज़ू का तक़ाज़ा लिए हुए

चश्म-ए-सियह में मस्तियाँ शाम-ए-विसाल की
आरिज़ फ़रोग़-ए-सुब्ह-ए-नज़ारा लिए हुए

हर एक शख़्स तर्क-ए-तमन्ना का मुद्दई'
हर एक शख़्स तेरी तमन्ना लिए हुए

कल शब तुलू-ए-माह का मंज़र अजीब था
तुम जैसे आ गए रुख़-ए-ज़ेबा लिए हुए

दिल आज तक है लुत्फ़-ए-फ़रावाँ से शर्मसार
लब आज तक हैं आप का शिकवा लिए हुए