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फिर वही ख़ाना-ए-बर्बाद हमारे लिए है | शाही शायरी
phir wahi KHana-e-barbaad hamare liye hai

ग़ज़ल

फिर वही ख़ाना-ए-बर्बाद हमारे लिए है

क़मर सिद्दीक़ी

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फिर वही ख़ाना-ए-बर्बाद हमारे लिए है
शहर-ए-ग़रनाता-ओ-बग़दाद हमारे लिए है

झेलना है हमें फिर कर्ब फ़रामोशी का
फिर वही सिलसिला-ए-याद हमारे लिए है

नींद के शहर-ए-तिलिस्मात मुबारक हों तुम्हें
जागते रहने की उफ़्ताद हमारे लिए है

ग़म हैं आशोब-ए-ख़ुदी में हमें वर्ना इक शहर
ख़ूँ से तर शोर से आबाद हमारे लिए है

ढूँडिए अक्स-ए-'क़मर' रात के आईने में
आज की शब यही इरशाद हमारे लिए है