फिर रुक नहीं सका हूँ किसी भी चटान से
ऐसा गिरा हूँ रोज़-ए-अज़ल आसमान से
है जब्र में भी एक गुमाँ इख़्तियार का
दो चार हर क़दम पे हों इक इम्तिहान से
अब मैं हूँ और हवाओं की साज़िश का सामना
इक तीर हूँ चला हूँ क़ज़ा की कमान से
इक आइना कि जिस में कहीं बाल पड़ गया
इक सिलसिला कि टूट गया दरमियान से
गुम-सुम खड़े हैं अब दर-ओ-दीवार और मैं
वो लोग कब के जा भी चुके हैं मकान से
ख़ुशियाँ जो मुझ को मिल न सकीं इस जहान में
मुझ को बुला रही हैं नए इक जहान से
इस बात का 'जमील' मुझे कुछ पता नहीं
इक़रार कर रहा हूँ मैं जिस का ज़बान से
ग़ज़ल
फिर रुक नहीं सका हूँ किसी भी चटान से
जमील यूसुफ़

