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फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई | शाही शायरी
phir jo dekha dur tak ek KHamushi pai gai

ग़ज़ल

फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई

रज़ी अख़्तर शौक़

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फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई
मैं तो समझा था कि इक मेरी ही गोयाई गई

फिर वही बादल कि जी उड़ने को चाहे जिन के साथ
फिर वही मौसम कि जब ज़ंजीर पहनाई गई

फिर वही ताइर वही उन की ग़ज़ल-ख़्वानी के दिन
फिर वही रुत जिस में मेरी नग़्मा-पैराई गई

कुछ तो है आख़िर जो सारा शहर तारीकी में है
या मिरा सूरज गया या मेरी बीनाई गई

थम गए सब संग सब शोर-ए-मलामत रुक गया
मैं ही क्या जी से गया सारी सफ़-आराई गई

पूछती है दस्तकें दे दे के शोरीदा हवा
किस का ख़ेमा था कि जिस में रौशनी पाई गई