फिर एक दाग़ चराग़-ए-सफ़र बनाते हुए
निकल पड़े हैं नई रह-गुज़र बनाते हुए
वो जस्त भर के हवा हो गया मगर न खुला
मैं किस नवाह में था उस के पर बनाते हुए
निकल सकी न कोई और सूरत-ए-तस्वीर
बहाए अश्क बहुत चश्म-ए-तर बनाते हुए
वो क़हर बरहमी-ए-बख़्त है कि डरते हैं
गिरा न लें कहीं दीवार दर बनाते हुए
क़दम क़दम पे सज़ा दे रहा है वक़्त हमें
हमारे ऐब उदू के हुनर बनाते हुए
तो ज़िंदगी को जिएँ क्यूँ न ज़िंदगी की तरह
कहीं पे फूल कहीं पर शरर बनाते हुए
ग़ज़ल
फिर एक दाग़ चराग़-ए-सफ़र बनाते हुए
जलील ’आली’

