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फिर आश्ना-ए-लज्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर हैं हम | शाही शायरी
phir aashna-e-lazzat-e-dard-e-jigar hain hum

ग़ज़ल

फिर आश्ना-ए-लज्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर हैं हम

जोश मलीहाबादी

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फिर आश्ना-ए-लज्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर हैं हम
फिर महरम-ए-कशाकश-ए-हर-ख़ैर-ओ-शर हैं हम

हर साँस दे रही है ख़बर काएनात की
फिर बादा-ए-जमाल से यूँ बे-ख़बर हैं हम

फिर इश्क़ की नज़र में है माशूक़ियत का नाज़
फिर हुस्न-ए-दिल-नवाज़ से शीर-ओ-शकर हैं हम

जीने के इश्तियाक़ से है फिर रामीदगी
फिर सीना-ए-हयात में अज़्म-ए-सफ़र हैं हम

हुश्यार-बाश ज़ुल्मत-ए-ग़म-ख़ाना-ए-हयात
फिर मरकज़-ए-तजल्ली-ए-शम्स-ओ-क़मर हैं हम

किस ज़ोम में है ऐ शब-ए-दैजूर-ए-ज़िंदगी
फिर राज़दार-ए-नूर-ए-तुलू-ए-सहर हैं हम

है किस ख़याल-ए-ख़ाम में ऐ ख़ारज़ार-ए-दहर
फिर कामरान-ए-ख़ंदा-ए-गुल-हा-ए-तर हैं हम

फिर ज़िंदगी है ग़म की अमानत लिए हुए
हर दौलत-ए-नशात से फिर बहरा-वर हैं हम

फिर फ़ैज़-ए-आशिक़ी से ब-ईं बे-बज़ाअती
जेब-ए-जहाँ में दौलत-ए-लाल-ओ-गुहर हैं हम

फिर बावजूद-ए-फ़क़्र वो हासिल है तुमतराक़
तू ये कहे कि साहिब-ए-ताज-ओ-कमर हैं हम

आँखों में नूर-ए-मुसहफ़-ए-जानाँ लिए हुए
फिर किर्दगार-ए-इश्क़ के पैग़ाम-बर हैं हम

खुलते नहीं हैं 'जोश' दिमाग़ों पे दिल के राज़
बाला-तर अज़ रसाई-ए-नक़्द-ओ-नज़र हैं हम