EN اردو
फैलाए जब दाम हवस ने रस्म-ए-मोहब्बत आम हुई | शाही शायरी
phailae jab dam hawas ne rasm-e-mohabbat aam hui

ग़ज़ल

फैलाए जब दाम हवस ने रस्म-ए-मोहब्बत आम हुई

ऋषि पटियालवी

;

फैलाए जब दाम हवस ने रस्म-ए-मोहब्बत आम हुई
पस्त हुआ मेआ'र वफ़ा का इक दुनिया बदनाम हुई

दिल ने काम लिया आँखों से ख़ामोशी पैग़ाम हुई
जल्वों की कसरत के आगे ताब-ए-नज़र नाकाम हुई

देखे हैं दस्तूर निराले हम ने वादी-ए-उल्फ़त में
राहें जब आसान हुईं तो सई-ए-तलब नाकाम हुई

चलती हैं किस की तदबीरें खेल हैं सब तक़दीरों के
शाम किसी की सुब्ह में बदली सुब्ह किसी की शाम हुई

महफ़िल महफ़िल बातें निकलीं क्या क्या चर्चे आम हुए
तेरा अदा-ए-कम-आमेज़ी किस हद तक बदनाम हुई

अव्वल अव्वल वहम-ए-दवा ने लुत्फ़-ए-सुकूँ बरबाद किया
आख़िर आख़िर दर्द की दौलत उल्फ़त का इनआ'म हुई

महव हुआ दीदार तलब दिल ऐसा उन के जल्वों में
गोया मिल कर भी मिलने की बात बराए-नाम हुई

क्या जाने क्यूँ दिल ने तेरी याद का दामन थाम लिया
मजबूरी आग़ाज़ हुई जब नाकामी अंजाम हुई

क्या कहिए किस किस की नज़र ने बद-ज़ौक़ी को आम किया
उन की नज़रों के होते क्यूँ दुनिया ग़र्क़-ए-जाम हुई

फ़िक्र-ए-ग़म-ओ-आलाम 'रिशी' है गोया नाम जुदाई का
उन की महफ़िल में कब दिल को फ़िक्र-ए-ग़म-ओ-आलाम हुई