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परतव-ए-हुस्न कहीं अंजुमन-अफ़रोज़ तो हो | शाही शायरी
partaw-e-husn kahin anjuman-afroz to ho

ग़ज़ल

परतव-ए-हुस्न कहीं अंजुमन-अफ़रोज़ तो हो

अज़ीज़ लखनवी

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परतव-ए-हुस्न कहीं अंजुमन-अफ़रोज़ तो हो
दिल-ए-पुर-दाग़ मिरा माया-ए-सद-सोज़ तो हो

कम से कम कोई तो सामाँ तिरे आने का करूँ
अतलस-ए-चर्ख़ तो हो बिस्तर-ए-गुल-दोज़ तो हो

रंग-ए-पैरा-ए-चमन-जोश में कलियाँ चटकें
खोल दे बंद-ए-नक़ाब आज कि नौ-रोज़ तो हो

दिल में पैवस्त न हो जो वो नज़र ही क्या है
तीर तरकश में अगर हो तो जिगर-दोज़ तो हो

न सही सोहबत-ए-फ़िरदौस जहन्नम ही सही
महफ़िल-ए-ऐश न हो अंजुमन-ए-सोज़ तो हो

क्या नतीजा है 'अज़ीज़' ऐसी जबीं-साई से
बुत का सज्दा हो मगर नासिया-अफ़रोज़ तो हो