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परतव-ए-हुस्न एक है और आइना-ख़ाने बहुत | शाही शायरी
partaw-e-husn ek hai aur aaina-KHane bahut

ग़ज़ल

परतव-ए-हुस्न एक है और आइना-ख़ाने बहुत

बिस्मिल सईदी

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परतव-ए-हुस्न एक है और आइना-ख़ाने बहुत
इक हक़ीक़त ने बना डाले हैं अफ़्साने बहुत

रुख़्सत ऐ चाक-ए-गरेबाँ दस्त-ए-वहशत अलविदा'अ
बढ़ चुके हैं अब जुनूँ की हद से दीवाने बहुत

खो न जाएँ कसरत-ए-असनाम में वहदत-परस्त
बंदगी के ज़ेहन में होते हैं बुत-ख़ाने बहुत

शम-ए-तुर्बत पर मिरी आते हुए जलते हैं पर
शम-ए-महफ़िल पर तो आ जाते थे परवाने बहुत

'बिस्मिल' इस दिल्ली के इन सुनसान वीरानों में आह
गूँजते हैं आज भी इबरत के अफ़्साने बहुत