परतव-ए-हुस्न एक है और आइना-ख़ाने बहुत
इक हक़ीक़त ने बना डाले हैं अफ़्साने बहुत
रुख़्सत ऐ चाक-ए-गरेबाँ दस्त-ए-वहशत अलविदा'अ
बढ़ चुके हैं अब जुनूँ की हद से दीवाने बहुत
खो न जाएँ कसरत-ए-असनाम में वहदत-परस्त
बंदगी के ज़ेहन में होते हैं बुत-ख़ाने बहुत
शम-ए-तुर्बत पर मिरी आते हुए जलते हैं पर
शम-ए-महफ़िल पर तो आ जाते थे परवाने बहुत
'बिस्मिल' इस दिल्ली के इन सुनसान वीरानों में आह
गूँजते हैं आज भी इबरत के अफ़्साने बहुत
ग़ज़ल
परतव-ए-हुस्न एक है और आइना-ख़ाने बहुत
बिस्मिल सईदी

