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पर्दे को जो लौ दे वो झलक और ही कुछ है | शाही शायरी
parde ko jo lau de wo jhalak aur hi kuchh hai

ग़ज़ल

पर्दे को जो लौ दे वो झलक और ही कुछ है

आनंद नारायण मुल्ला

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पर्दे को जो लौ दे वो झलक और ही कुछ है
नादीदा है शो'ला तो लपक और ही कुछ है

टकराते हुए जाम भी देते हैं खनक सी
लड़ती हैं निगाहें तो खनक और ही कुछ है

इशरत-गह-ए-दौलत भी है गहवारा-ए-निकहत
मेहनत के पसीने की महक और ही कुछ है

हाँ जोश जवानी भी है इक ख़ुल्द-ए-नज़ारा
इक तिफ़्ल की मा'सूम हुमक और ही कुछ है

शब को भी महकती तो हैं ये अध-खिली कलियाँ
जब चूम लें किरनें तो महक और ही कुछ है

कमज़ोर तो झुकता ही है क़ानून के आगे
ताक़त कभी लचके तो लचक और ही कुछ है

अश्कों से भी हो जाता है आँखों में चराग़ाँ
बिन-बरसी निगाहों की चमक और ही कुछ है

रो कर भी थके जिस्म को नींद आती है लेकिन
बच्चे के लिए माँ की थपक और ही कुछ है

बज़्म-ए-अदब-ए-हिन्द के हर गुल में है ख़ुश्बू
'मुल्ला' गुल-ए-उर्दू की महक और ही कुछ है