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पर्दा-ए-शब की ओट में ज़ोहरा-जमाल खो गए | शाही शायरी
parda-e-shab ki oT mein zohra-jamal kho gae

ग़ज़ल

पर्दा-ए-शब की ओट में ज़ोहरा-जमाल खो गए

शकेब जलाली

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पर्दा-ए-शब की ओट में ज़ोहरा-जमाल खो गए
दिल का कँवल बुझा तो शहर तीरा-ओ-तार हो गए

एक हमें ही ऐ सहर नींद न आई रात भर
ज़ानू-ए-शब पे रख के सर सारे चराग़ सो गए

राह में थे बबूल भी रूद-ए-शरर भी धूल भी
जाना हमें ज़रूर था गुल के तवाफ़ को गए

दीदा-वरो बताएँ क्या तुम को यक़ीं न आएगा
चेहरे थे जिन के चाँद से सीने में दाग़ बो गए

दाग़-ए-शिकस्त दोस्तो देखो किसे नसीब हो
बैठे हुए हैं तेज़-रौ सुस्त-ख़िराम तो गए

अहल-ए-जुनूँ के दिल 'शकेब' नर्म थे मोम की तरह
तेशा-ए-यास जब चला तूदा-ए-संग हो गए