EN اردو
पंखुड़ी कोई गुलिस्ताँ से सबा क्या लाई | शाही शायरी
pankhuDi koi gulistan se saba kya lai

ग़ज़ल

पंखुड़ी कोई गुलिस्ताँ से सबा क्या लाई

नुशूर वाहिदी

;

पंखुड़ी कोई गुलिस्ताँ से सबा क्या लाई
दूर तक निकहत-ए-गुल ख़ाक उड़ाती आई

उफ़ वो बेगाना निगाहों की करम-फ़रमाई
फ़ितरत-ए-इश्क़ ब-अंदाज़-ए-जुनूँ थर्राई

ताज़ा ताज़ा वो शिकस्त-ए-सुख़न-ए-रा'नाई
चुप हुए वो तो तबस्सुम की झलक सी आई

आख़िर-ए-शब वो सितारों की सरकती हुई छाँव
मैं वहीं बैठ गया रात जहाँ लहराई

जागी जागी हुई पलकें वो ब-आग़ोश-ए-जमाल
दिल को आराम ज़ियादा था तो कम नींद आई

वक़्त ने ज़र्फ़-ए-नज़र को लब-ए-मय-ख्वार किया
तिश्नगी शीशे को पैमाना बना कर लाई

ज़िंदगी एक हुजूम-ए-गुज़राँ है लेकिन
आदमी अपनी जगह आलम-ए-सद-तन्हाई

अपने ही शोला-ए-रंगीं से जला दामन-ए-गुल
अपनी ही शाख़-ए-तबस्सुम पे कली मुरझाई

मंज़िल-ए-अक़्ल जुनूँ रंग उसे मिलती है
जिस ने इक बार रह-ए-इश्क़ में ठोकर खाई

पत्ते पत्ते का नहीं गुलशन-ए-आलम में जवाब
ज़र्रे ज़र्रे में धड़कता है दिल-ए-यकताई

टूटती सी रग-ए-दौराँ ये तरक़्क़ी की थकन
किसी मा'शूक़-ए-सहर-ख़ेज़ की नीम-अंगड़ाई

ख़ाक और ख़ून से इक शम्अ' जलाई है 'नुशूर'
मौत से हम ने भी सीखी है हयात-आराई