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पलकों से अपने भूले हुए ख़्वाब बाँध लें | शाही शायरी
palkon se apne bhule hue KHwab bandh len

ग़ज़ल

पलकों से अपने भूले हुए ख़्वाब बाँध लें

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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पलकों से अपने भूले हुए ख़्वाब बाँध लें
जब ठान ली सफ़र की तो अस्बाब बाँध लें

साहिल पे कोई ग़ोल न उस पर झपट पड़े
ढूँडा है जो ख़ज़ीना तह-ए-आब बाँध लें

इस आख़िरी नज़ारे को गर अपना बस चले
हर शय की दौड़ से दिल-ए-बे-ताब बाँध लें

जीना तो है ज़रूर मगर अपने इर्द-गिर्द
क्यूँ इक हिसार-ए-गुम्बद-ओ-मेहराब बाँध लें

यूँ हो कि आरज़ू न उभर पाए फिर कभी
दिल के लहू से रिश्ता-ए-गिर्दाब बाँध लें

शाने से अब सरकने लगी है सलीब-ए-ग़म
रुक कर ज़रा बिखरते हुए ख़्वाब बाँध लें

मिन्हा कुछ ऐसे अपनी ही तहरीर से हुए
जो बच रहा है अब वही अस्बाब बाँध लें

'शाहीन' उस की नज़्र करेंगे ख़िराज-ए-दिल
शीराज़ा-ए-जुनूँ में नया बाब बाँध लें