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पहुँच के हम सर-ए-मंज़िल जिन्हें भुला न सके | शाही शायरी
pahunch ke hum sar-e-manzil jinhen bhula na sake

ग़ज़ल

पहुँच के हम सर-ए-मंज़िल जिन्हें भुला न सके

फ़रीद जावेद

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पहुँच के हम सर-ए-मंज़िल जिन्हें भुला न सके
वो हम-सफ़र थे जो कुछ दूर साथ आ न सके

तमाम उम्र पशेमानियों में बीत गई
ब-क़द्र-ए-शौक़ मोहब्बत के नाज़ उठा न सके

मुझे ख़याल है उन दिल-गिरफ़्ता कलियों का
जिन्हें नसीम-ए-सहर छेड़ दे खिला न सके

कुछ ऐसे दर्द भी हैं ज़िंदगी की राहों में
जहाँ हिजाब-ए-तबस्सुम भी काम आ न सके

करम की आस के सायों में बुझ गया वो चराग़
हवा-ए-यास के झोंके जिसे बुझा न सके

अँधेरी शब थी सितारों से क्या सुकूँ मिलता
सितारे भी तो बहुत देर जगमगा न सके

ग़ज़ल के हुस्न का एहसास उस को क्या 'जावेद'
ख़ुलूस-ए-नर्मी-ए-गुफ़्तार को जो पा न सके