पहले तो दर्द-ए-दिल का ख़ुलासा करे कोई
तब उन से शरह-ए-हाल-ए-तमन्ना करे कोई
दर्द-ए-जिगर का पहले मुदावा करे कोई
जब तू मसीह होने का दा'वा करे कोई
मुमकिन नहीं कि सफ़्हा-ए-हस्ती पे मिल सके
मेरे निशान-ए-क़ब्र को ढूँढा करे कोई
बदले न करवटें भी कोई फ़र्श-ए-ख़्वाब पर
ग़म से तड़प तड़प के सवेरा करे कोई
सुनना है दर्द-ए-दिल की मिरे दास्ताँ अगर
पत्थर का पहले अपना कलेजा करे कोई
शाम-ए-शब-ए-फ़िराक़ है ताकीद-ए-ज़ब्त-ए-आह
दिल में उठे जो दर्द तो फिर क्या करे कोई
ख़ामोश इस तरह से हुए सकिनान-ए-क़ब्र
देते नहीं जवाब पुकारा करे कोई
'शो'ला' मुहाल है कि बढ़े दिल की रौशनी
जब तक ख़याल-ए-दोस्त न पैदा करे कोई
ग़ज़ल
पहले तो दर्द-ए-दिल का ख़ुलासा करे कोई
शोला करारवी

