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पहले तो दर्द-ए-दिल का ख़ुलासा करे कोई | शाही शायरी
pahle to dard-e-dil ka KHulasa kare koi

ग़ज़ल

पहले तो दर्द-ए-दिल का ख़ुलासा करे कोई

शोला करारवी

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पहले तो दर्द-ए-दिल का ख़ुलासा करे कोई
तब उन से शरह-ए-हाल-ए-तमन्ना करे कोई

दर्द-ए-जिगर का पहले मुदावा करे कोई
जब तू मसीह होने का दा'वा करे कोई

मुमकिन नहीं कि सफ़्हा-ए-हस्ती पे मिल सके
मेरे निशान-ए-क़ब्र को ढूँढा करे कोई

बदले न करवटें भी कोई फ़र्श-ए-ख़्वाब पर
ग़म से तड़प तड़प के सवेरा करे कोई

सुनना है दर्द-ए-दिल की मिरे दास्ताँ अगर
पत्थर का पहले अपना कलेजा करे कोई

शाम-ए-शब-ए-फ़िराक़ है ताकीद-ए-ज़ब्त-ए-आह
दिल में उठे जो दर्द तो फिर क्या करे कोई

ख़ामोश इस तरह से हुए सकिनान-ए-क़ब्र
देते नहीं जवाब पुकारा करे कोई

'शो'ला' मुहाल है कि बढ़े दिल की रौशनी
जब तक ख़याल-ए-दोस्त न पैदा करे कोई