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पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो | शाही शायरी
pas-e-adab mujhe unhen sharm-o-haya na ho

ग़ज़ल

पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो

बेदम शाह वारसी

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पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो
नज़्ज़ारा-गाह में असर-ए-मा-सिवा न हो

माना मिरी क़ुबूल नहीं है दुआ न हो
इतना ही हो कि उस पे असर ग़ैर का न हो

क्यूँ कर कहूँ कि पास उन्हें ग़ैर का न हो
जो ग़ुस्से में भी कहते हैं तेरा बुरा न हो

इस पर्दे में तो कितने गिरेबान चाक हैं
वो बे-हिजाब हों तो ख़ुदा जाने क्या न हो

तकिए में क्या रखा है ख़त-ए-ग़ैर की तरह
देखूँ तो मैं नविश्ता-ए-क़िस्मत मिरा न हो

मिल कर गले वो करते हैं ख़ंजर की तरह काट
इस पर भी कह रहा हूँ कि मुझ से जुदा न हो

मूसा का हाल देख के दिल काँपने लगा
अब तो दुआ है उन से मिरा सामना न हो

वो बार बार मेरा लिपटना शब-ए-विसाल
उन का झिजक के कहना कोई देखता न हो

'बेदम' की ज़िंदगी है इसी छेड़-छाड़ में
तर्क-ए-वफ़ा की तरह से तर्क-ए-जफ़ा न हो