पानी सियाने देते हैं क्या फूँक फूँक कर
दिल सोज़-ए-ग़म ने ख़ाक किया फूँक फूँक कर
छिड़काव आब-ए-तेग़ का है कू-ए-यार में
पाँव इस ज़मीं पे रखिए ज़रा फूँक फूँक कर
देखा न आँख-भर के नज़र के ख़याल से
लेते हैं हम तो नाम तिरा फूँक फूँक कर
होगा न साफ़ झूटी हवा-ख़्वाहियों से दिल
यूँ दिल का कब ग़ुबार उड़ा फूँक फूँक कर
बाद-ए-नफ़स से दाग़-ए-दिल-ए-सर्द जल उठे
हम ने जिला दिया है दिया फूँक फूँक कर
उल्टा है क्या इस आह-ए-शरर-बार का असर
दिल ही बुझा दिया है मिरा फूँक फूँक कर
पीरी में आएगी न कभी ताक़त-ए-शबाब
ऐ पीर लाख पारे को खा फूँक फूँक कर
शैताँ का धोका ज़ाहिद-ए-पुर-फ़न पे क्यूँ न हो
पीता है छाछ दूध-जला फूँक फूँक कर
आतिश-बयानी-ए-लब-ए-'कैफ़ी' ने बज़्म में
दुश्मन के दिल को ख़ाक किया फूँक फूँक कर
ग़ज़ल
पानी सियाने देते हैं क्या फूँक फूँक कर
दत्तात्रिया कैफ़ी

