पा-ए-ग़ैर और मेरा सर देखो
टूट जाए न संग-ए-दर देखो
एक आलम पड़ा है चक्कर में
गर्दिश-ए-चश्म-ए-फ़ित्ना-गर देखो
मैं नज़र-बंद ग़ैर मद्द-ए-नज़र
अपना दिल और मिरा जिगर देखो
चश्म पुर-नम है तन ग़ुबार-आलूद
आन कर सैर-ए-बहर-ओ-बर देखो
फ़िक्र-ए-इफ़शा-ए-राज़ क्यूँ न करूँ
क्या हया-ख़ेज़ है नज़र देखो
है दिगर-गूँ मरीज़-ए-ग़म का हाल
हो सके तो दवा भी कर देखो
ग़ैर झलते हैं अब उन्हें पंखा
असर-ए-आह-ए-पुर-शरर देखो
कम-नुमाई-ओ-ख़ेशतन-बीनी
कितने बे-दीद हो इधर देखो
ग़ज़ल
पा-ए-ग़ैर और मेरा सर देखो
इस्माइल मेरठी

