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पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग | शाही शायरी
pa-ba-zanjir sahi zamzama-KHwan hain hum log

ग़ज़ल

पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग

उबैदुल्लाह अलीम

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पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग
महफ़िल-ए-वक़्त तिरी रूह-ए-रवाँ हैं हम लोग

दोश पर बार-ए-शब-ए-ग़म लिए गुल की मानिंद
कौन समझे कि मोहब्बत की ज़बाँ हैं हम लोग

ख़ूब पाया है सिला तेरी परस्तारी का
देख ऐ सुब्ह-ए-तरब आज कहाँ हैं हम लोग

इक मता-ए-दिल-ओ-जाँ पास थी सो हार चुके
हाए ये वक़्त कि अब ख़ुद पे गराँ हैं हम लोग

निकहत-ए-गुल की तरह नाज़ से चलने वालो
हम भी कहते थे कि आसूदा-ए-जाँ हैं हम लोग

कोई बतलाए कि कैसे ये ख़बर आम करें
ढूँडती है जिसे दुनिया वो निशाँ हैं हम लोग

क़िस्मत-ए-शब-ज़दगाँ जाग ही जाएगी 'अलीम'
जरस-ए-क़ाफ़िला-ए-ख़ुश-ख़बराँ हैं हम लोग