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नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना | शाही शायरी
nuqush-e-rahguzar-e-shauq sab miTa dena

ग़ज़ल

नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना

शाहिद इश्क़ी

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नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना
रही है जाँ सो उसे भी कहीं गँवा देना

रह-ए-हयात में हर मोड़ पर है इक उलझन
बिछड़ न जाऊँ कहीं दोस्तो सदा देना

ग़ुबार-ए-वक़्त ने धुँदला दिए हैं इस के नुक़ूश
ज़रा चराग़-ए-मोहब्बत की लौ बढ़ा देना

सुना है शहर में फिर आ गया है वो क़ातिल
मिले तो दोस्तो मेरा पता बता देना

तलब तो करना मिरी उम्र-ए-राएगाँ का हिसाब
हिसाब तूल-ए-शब-ए-हिज्र का चुका देना