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नियाज़-ए-इश्क़ है नाज़-ए-बुताँ है | शाही शायरी
niyaz-e-ishq hai naz-e-butan hai

ग़ज़ल

नियाज़-ए-इश्क़ है नाज़-ए-बुताँ है

रईस नियाज़ी

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नियाज़-ए-इश्क़ है नाज़-ए-बुताँ है
मोहब्बत काएनात-ए-दो-जहाँ है

हिजाबात-ए-तअय्युन उठ रहे हैं
निगाह-ए-शौक़ तेरा इम्तिहाँ है

मसर्रत भी बड़ी ने'मत है लेकिन
तिरे ग़म से मुझे फ़ुर्सत कहाँ है

न रहबर है न जादा है न मंज़िल
निगाहों में ग़ुबार-ए-कारवाँ है

तिरे नक़्श-ए-क़दम पर चल रहा हूँ
ख़ुदा जाने मिरी मंज़िल कहाँ है

मिरा ज़ौक़-ए-सियह-कारी न पूछो
तुम्हारे ही करम का इम्तिहाँ है

यही शायद है तकमील-ए-तसव्वुर
मुझे ख़ुद पर भी अब उन का गुमाँ है

तुम अपने ग़म की अज़्मत मुझ से पूछो
तुम्हारा ग़म हयात-ए-जाविदाँ है

ये दुनिया है 'रईस'-ए-सोख़्ता-जाँ
यहाँ हर गाम पर इक इम्तिहाँ है