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निशात-ए-मंज़िल-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र को याद करो | शाही शायरी
nishat-e-manzil-e-qalb-o-nazar ko yaad karo

ग़ज़ल

निशात-ए-मंज़िल-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र को याद करो

रईस अख़तर

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निशात-ए-मंज़िल-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र को याद करो
सफ़र में अपने किसी हम-सफ़र को याद करो

बड़े ख़ुलूस से तारीक रास्तों पे चलो
बड़े तपाक से हुस्न-ए-सहर को याद करो

जले चराग़ तो चुपके से नाम लो मेरा
मिले ख़ुशी तो मिरी चश्म-ए-तर को याद करो

जो दिल में रह के भी अंजान सी रही बरसों
किसी की उस निगह-ए-फ़ित्ना-गर को याद करो

दिल-ए-हज़ीं का तक़ाज़ा है जादा-ए-ग़म में
नज़र के साथ फ़रेब-ए-नज़र को याद करो

क़दम क़दम पे जहाँ ज़िंदगी निखरती थी
किसी के प्यार की उस रहगुज़र को याद करो

है जिस के फ़ैज़ से अब तक भी रौशनी घर में
'रईस' अब भी उसी चश्म-ए-तर को याद करो